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<title>به فردا لبخند زنید</title>
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<title>موزیم ملی افغانستان و نود سال پر فراز و نشیب</title>
<link>http://labkhandefarda.blogfa.com/post-58.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 338px; HEIGHT: 206px&quot; hspace=0 src=&quot;http://cache.daylife.com/imageserve/070N9iMc2AaWG/610x.jpg&quot; align=bottom border=0&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#0000ff size=1&gt;نمایشگاه آثار باستانی کشف شده از منطقه طلا تپه در شمال افغانستان - پاریس &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;B&gt;   ۸&lt;/B&gt;&lt;B&gt; مه برابر با &lt;/B&gt;&lt;B&gt;۲۹&lt;/B&gt;&lt;B&gt; ثور (اردیبهشت) روز جهانی موزیم (موزه) است و همه ساله از این روز در کشورهای مختلف جهان تجلیل می شود. افغانستان نیز از کشورهایی است که موزیم ملی آن - تا قبل از جنگ های داخلی - از گنجینه های مهم منطقه به شمار می رفت.&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#0000ff&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#0000cc&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;IMG src=&quot;http://portal.unesco.org/culture/en/files/35143/11924547221KabulMuseum190.gif/KabulMuseum190.gif&quot;&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;    &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;   &lt;/STRONG&gt;موزیم ملی افغانستان برای اولین بار در سال ۱۲۹۷ خورشیدی در منطقه باغ بالای کابل، برای نگهداری آثار تاریخی تاسیس شد.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   در سالهای اولیه تاسیس این موزیم که در آن دوران &quot;&lt;STRONG&gt;عجایب خانه&lt;/STRONG&gt;&quot; نام داشت، فقط بعضی از آثار تاریخی مثل قرآن های خطی، صنایع دستی، آثار برجای مانده از جنگ های دوران استقلال و بعضی کتاب های کمیاب در آن نگهداری می شد. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   در ۲۵عقرب سال ۱۳۰۳ خورشیدی، موزیم ملی افغانستان از باغ بالا به ارگ کابل منتقل شد و به شکل رسمی توسط امان الله خان افتتاح شد. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   در مراسم افتتاح این موزیم، محمود طرزی که در آن دوران وزیر خارجه افغانستان بود و فیض محمد وزیر معارف وقت، در مورد ارزش و حراست از آثار تاریخی سخنرانی کردند. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   بعضی از شخصیت های مهمی که در افتتاح موزیم ملی افغانستان حضور داشتند آثار عتیقه و کم یاب خود را به این موزیم اهدا کردند.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   در اولین قانون اساسی افغانستان که در زمان امان الله خان به تصویب رسید، یک ماده مفصل به حفریات و حفظ آثار تاریخی و تشکیل محلی برای نگهداری آثار تاریخی این کشور اختصاص داده شد. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   به موجب این قانون، مقرر شد که شعبه &quot;حفریات و موزیم&quot; زیر نظر وزارت معارف (آموزش و پرورش) فعالیت کند. از مهم ترین کارهای این شعبه، کشف و حراست از آثار تاریخی و انتقال آنها به موزیم ملی بود. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   از آنجایی که دولت افغانستان امکانات و نیروی انسانی لازم را برای کشف آثار باستانی در اختیار نداشت قراردادی به این منظور با دولت فرانسه به امضا رساند. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;DIV align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   به موجب این قرارداد مقرر شد که یک هیات فرانسوی به سرپرستی &quot;موسیو فوشه&quot; به افغانستان سفر کند و در کنار کاوشگران افغانی به کشف و شناسایی آثار تاریخی بپردازد. &lt;/FONT&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   این قرار داد به فرانسوی های حق می داد که از دو اثر کشف شده مشابه یکی از آنها را به فرانسه انتقال دهند.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   احمدعلی کهزاد مورخ و باستان شناس افغان یکی از کسانی بود که در کنار کاوشگران خارجی به جستجوی آثار تاریخی می پرداخت که کشف بسیاری از آثار تاریخی افغانستان با تلاش های او بوده است. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;غارت&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;  &lt;/STRONG&gt; با بروز شورش های منجر به سقوط حکومت امان الله خان، موزیم ملی هم مورد غارت قرار گرفت و تعدادی از مجسمه های تاریخی آن نابود شد. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   با روی کار آمدن نادرخان، آثار باقی مانده از موزیم ملی به دارالامان کابل منتقل شد و برای هر بخش جای جداگانه ای اختصاص یافت. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;عضویت در یونسکو&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;  &lt;/STRONG&gt; در دوره حکومت ظاهر شاه، افغانستان به عضویت سازمان علمی، آموزشی و فرهنگی ملل متحد - یونسکو - پذیرفته شد. با توجه به اینکه سرزمین افغانستان از نظر تاریخی مهم و دست نخورده باقی مانده بود، توجه کاوشگران کشورهای مختلف به سوی این کشور جلب شد. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   در این دوران، بعضی از آثار تاریخی موزیم ملی در فهرست آثار تاریخی یونسکو به ثبت رسید و گاوشگرانی از فرانسه، ایتالیا، آلمان و شوروی سابق، برای کشف آثار تاریخی افغانستان به این کشور سفر کردند. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   در زمان حکومت داوود خان و با کشف آثار تاریخی که هر روزه از دل خاک بیرون می آمد و به موزیم ملی در کابل منتقل می شد، این موزیم به یکی از گنجینه های مهم منطقه تبدیل شد. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;DIV align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   از ویژگی های مهم موزیم ملی افغانستان این بود که تمام آثار به نمایش گذاشته شده در آن از داخل خود این کشور کشف شده بود. &lt;/FONT&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;آثار موزیم&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#0033ff&gt;   برجسته کاری های مرمرین بودایی، آثار سنگی متعلق به ماقبل تاریخ، برنزهای رومی، مسکوکات دوره های مختلف، مجسمه های قبل از میلاد، بخشی از آثار موزیم ملی را تشکیل می دادند. &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 258px; HEIGHT: 353px&quot; src=&quot;http://www.clt.astate.edu/wallen/digits/KabulMus/wpe1F.jpg&quot;&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 294px; HEIGHT: 354px&quot; src=&quot;http://kaladarshan.arts.ohio-state.edu/jpgs/LostStole/Afgh/stucco/A1139FemaleFigure&amp;Triratna.jpeg&quot;&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#0000cc&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#0033ff&gt;    آثار تاریخی از دوران صدر اسلام نیز بخش دیگری از موزیم را شکل می داد که از مهم ترین این آثار می توان به &lt;STRONG&gt;قرآن کوفی به خط عثمان بن عفان خلیفه سوم اسلامی، آیاتی از قرآن به خط امام حسن و نیز به قرآن خط کوفی که در سال ۱۳۳۴ از &quot;شهر غلغله&quot;&lt;/STRONG&gt; کشف شده بود اشاره کرد. &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#0033ff&gt;    آثار خطی شاعران بزرگ زبان فارسی دری نیز در موزیم کابل نگهداری می شد؛ هفت اورنگ عبدالرحمان جامی، هفت پیکر نظامی گنجوی، هشت بهشت و لیلی و مجنون امیر خسرو دهلوی، که همه این آثار در سال ۸۹۹ هجری کتابت و تذهیب شده بودند بخشی از آثار ادبی موزه را شکل می دادند. &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#0033ff&gt;   بوستان سعدی به خط میرعماد خطاط معروف عصر تیموری، دیوان میرزا عبدالقادر بیدل که از طرف امیر بخارا به پادشاه افغانستان، امیر حبیب الله اهدا شده بود، دیوان حافظ به خط میر محمد محسن که برای سلطان حسن بایقرا نوشته شده بود و چند اثر مهم دیگر نیز از جمله آثار بخش ادبی و هنری موزیم بود. &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#0033ff&gt;   از مهم ترین آثار هنری دیگر موزیم ملی افغانستان نیز می توان به آثار مینیاتوری از استاد کمال الدین بهزاد اشاره کرد.&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#0033ff&gt;   با توجه به کثرت آثار کشف شده، علاوه بر کابل در شهرهای هرات، میمنه، غزنی، بلخ و قندهار نیز چند موزیم بوجود آمد که موزیم هرات با بیش از ۴۰۰۰ اثر تاریخی بیشترین آثار را در خود جای داده بود. &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;انتقال دوباره&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;DIV align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;   &lt;/STRONG&gt;با وقوع کودتای ۷ ثور۱۳۵۷ خورشیدی و پس از آن، با تجاوز نیروهای شوروی به افغانستان، موزیم ملی افغانستان از کاخ دارالامان به ارگ ریاست جمهوری انتقال یافت که در زمان انتقال، بعضی از آثار تخریب و سرقت شد. &lt;/FONT&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   در زمان حکومت دکتر نجیب الله، موزه ملی دوباره به دارالامان کابل منتقل شد. هرچند که دیگر کمتر کاری برای کشف آثار باستانی صورت می گرفت ولی تا زمان سقوط دکتر نجیب الله، هیچ گونه آسیب جدی به موزیم کابل نرسید و تمام آثار موزیم دست نخورده باقی مانده بود. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;تخریب و غارت&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;   &lt;/STRONG&gt;با ورود نیروهای مجاهدین به شهر کابل و با گسترش جنگ در داخل پایتخت، از ساختمان موزیم ملی نیز به عنوان سنگر نبرد استفاده شد. در این دوره، بیش از هفتاد درصد آثار ارزشمند این گنجینه نابود شد و یا مورد غارت قرار گرفت. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;    پس از سقوط حکومت مجاهدین و آمدن طالبان به کابل، بیشتر آثار باقی مانده این موزیم، به خصوص مجسمه هایی که تا آن زمان هنوز در موزیم باقی مانده بود، توسط طالبان که هر نوع مجسمه ای را کفر آمیز می دانستند از بین برده شد. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;   حتی گفته می شود که وزیر اطلاعات و فرهنگ طالبان با دست خود بعضی از مجسمه های موزیم را از بین برده است.&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 276px; HEIGHT: 175px&quot; src=&quot;http://news.bbc.co.uk/olmedia/1195000/images/_1198181_museum300.jpg&quot;&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;ن&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;جات بعضی از آثار&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;&lt;STRONG&gt;  &lt;/STRONG&gt; عمر خان مسعودی از مسئولان موزیم کابل تنها کسی بود که با تلاش شخصی خود در دوران جنک های داخلی و زمان طالبان بیش از بیست هزار اثر موزیم را به مکان های امن منتقل کرد تا از بین نرود. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   وی در سال ۱۳۸۴ خورشیدی جایزه جهانی &quot;شاهزاده کلاوس&quot; هلند را به خاطر نجات آثار موزیم افغانستان دریافت کرد. وی نهمین دریافت کننده جایزه شاهزاده کلاوس در جهان است. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;بازسازی&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;DIV align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   با روی کار دولت تحت حمایت جامعه جهانی در افغانستان، تلاش برای احیای مجدد موزیم های افغانستان آغاز شد و موزیم کابل با هزینه ۳۵۰ هزار دلار که از سوی مجامع جهانی پرداخت شده بود در مدت یک سال دوباره بازسازی شد. &lt;/FONT&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   تلاش برای بازگرداندن آثار غارت شده که بیشتر آنها به پاکستان قاچاق شده و از آنجا به کشورهای اروپایی رسیده بود، از مهم ترین برنامه هایی بود که وزارت اطلاعات و فرهنگ افغانستان روی دست گرفت. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   برخی از مطبوعات افغانستان ادعا کرده بودند که نصرالله بابر وزیر داخله وقت پاکستان و بینظیر بوتو نخست وزیر آن کشور، شماری از آثار غارت شده را در اختیار دارند. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   سید مخدوم رهین وزیر اطلاعات و فرهنگ سابق افغانستان، با ارسال نامه ای به نصر الله بابر، رسما از وی خواست تا آثار غارت شده را به افغانستان باز گرداند. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   تعدادی زیادی از آثار نیز از راه پاکستان به کشورهای اروپایی منتقل شده و در حراجی های گوناگون خرید و فروش شده بود.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   در سالهای اخیر با حمایت یونسکو و با تلاش وزارت اطلاعات و فرهنگ افغانستان، تعداد زیادی از آثار غارت شده این کشور، از کشورهای اروپایی بازگردانده شده است و هنوز هم بسیاری از این آثار در موزیم های کشورهای اروپایی نگهداری می شود. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   اخیراً نیز، وزارت اطلاعات و فرهنگ افغانستان اعلام کرد که دور تازه ای از کاوش آثار تاریخی را در نقاط مختلف کشور آغاز کرده است.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;   با وجود همه این تلاش ها، موزيم ملی افغانستان در کابل، با اهمیت و ابهت گذشته خود و رونقی که پیش از جنگ داشت، فاصله بسیاری دارد.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 20 Nov 2008 06:54:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=labkhandefarda&amp;postid=58</comments>
<dc:creator>labkhandefarda</dc:creator>
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<title>دانشجويان دانشگاه كابل: تاجيك بدون پشتون و پشتون بدون هزاره معنا ندارد</title>
<link>http://labkhandefarda.blogfa.com/post-57.aspx</link>
<description>&lt;P align=center&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt;
&lt;P align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://chrisbarton.files.wordpress.com/2008/03/holding-hands.jpg&quot; align=baseline border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;دانشجويان دانشگاه كابل: تاجيك بدون پشتون و پشتون بدون هزاره معنا ندارد&lt;/STRONG&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT class=articleBody&gt;جمعيتى از دانشجويان دانشگاه كابل ديروز كوشيدند تا لوحۀ جديد آن دانشگاه را كه به سه زبان تحرير شده بود بالاى در دخولى دانشگاه كابل نصب نمايندكه با مشكلاتى مواجه شدند.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;تصميم اين جمعيت بر نصب لوحۀ جديد بعد از آن صورت گرفت كه يكشنبه شب برخى بلاکارت ها كه در آن روز جهانى دانشجویان با كلمات دانشجو و دانشگاه تبريك گفته شده بود از سوى پوليس از ديوار ها دور ساخته شده و واكنش جمعيت عظيمى از دانشجویان را برانگيخت، آنها ديروز تصميم گرفتند تا لوحۀ جديد را كه به سه زبان تحرير شده بود بر در دخولى دانشگاه كابل نصب نمايند، مگر با پوليس مواجه شدند، اين دانشجويان ادعا دارند كه پوليس با آنها سلوك خوب نكرده، بل با آنها درگير شده و شمارى را لت و كوب و مجروح ساخته است.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;بعداً پوليس توانست نظم را كنترول نمايد و شمارى از دانشجويان وقت يافتند تا نظريات شان را بيان بدارندتعداد زيادى از دانشجویان اجازه نيافتند تا از بيرون داخل صحن دانشگاه شوند و در اجتماع دانشجویان شركت نمايند، يك تن از سخنرانان، رئيس جمهور حامد كرزى را متهم ساخت كه با انديشۀ قبيله گرايانه مشكلات زيادى را در كشور بار آورده و وضعيت در كشور چنان شكل گرفته كه از آن امريكا، انگليس و پاكستان سود مى برند.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;او گفت: طبعيت حق سخن گفتن به زبان مادرى را تضمين نموده و قانون اساسى كشور بر آن صحه گذاشته است.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;وى اضافه داشت، كه همه اقوام در كشور يك وجود واحد اند ، تاجيك بدون پشتون و يا پشتون بدون هزاره معنا ندارد. ما مى خواهيم به زبان خود سخن بگوييم، نبايد براى سخن گفتن ما ترافيك تعيين شود تا مسير سخن گفتن و گپ زدن را براى ما نشان دهد و رهنمايى كند.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;او اضافه داشت، برخى ها مي كوشند تا نظر و خواست خود را بر ديگران تحميل بدارند ، در حالى كه قانون اساسى كشور تكلم و تحصيل را به زبان مادرى تضمين نموده است.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;تعدادى از اين دانشجویان در حالى كه با شعار هاى زنده باد وحدت ملى، زنده باد دانشگاه و زنده باد پوهنتون سر مى دادند ، از مسؤولان خواستند تا اجازه دهند كه لوحۀ دانشگاه كابل به دو زبان ملى و زبان انگليسى در در دخولى دانشگاه نصب گردد و تأكيد داشتند كه اين لوحه حق هيچكسى را زير پا نكرده و احساسات هيچكسى را جريحه دار نمى سازد.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;در حالى كه اين جمعيت دانشجویان غرض نصب لوحۀ جديد تلاش مى كردند، جمعيت ديگرى در مقابل آنها ايستادند كه مخالف نصب اين لوحه بودند، اين جمعيت كه حدود صد تن بودند بعد از دادن شعار ها متوارى شدند.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;دانشجویان كه خواستار نصب لوحۀ جديد بودند تا عصر ديروز مؤفق به كار مورد هدف شان نشدند، اما گفته مى شود كه يك تعداد از اعضاى ولسى جرگه با اين دانشجويان همنوا شده و به آنها وعدۀ همكارى داده و از دانشجويان خواسته اند تا به اعتصاب نشستۀ خود پايان دهند، اما دانشجويان تهديد كرده اند كه اگر تا فردا به خواست آنها لبيك گفته نشود، آنها به اعتصاب خويش ادامه خواهند داد.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;يك تن از دانشجویان تأكيد كرد كه اين لوحه در هر حالت آن نصب خواهد شد.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;&lt;/FONT&gt;</description>
<pubDate>Tue, 18 Nov 2008 13:31:18 GMT</pubDate>
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<title>زهرِ زهرها «ناداني» است</title>
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<description>&lt;P class=lead1 dir=rtl align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.noma-afg.org/uploads/Girls%20going%20to%20school.jpg&quot; align=baseline border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;DIV class=lead1 dir=rtl align=justify&gt;   &lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=lead1 dir=rtl align=justify&gt;   زهرِ زهرها «ناداني» است؛ ناداني روح انسان را مي‌كشد. اين «زهر زهرها» بيش از هركسي روح و جان مردمِ افغانستان را تباه و مسموم كرده است؛ تاريخِ اين كشور، تاريخ و جهل و تباهي است؛ نبردِ ديرينه با آگاهي و انسانيت، اما بايد در برابرِ اين تاريخ سر به ‌سر جهل به پا ايستاد. اين تصوير كه توسط استاد «نجيب‌الله مسافر» گرفته‌شده، كودكاني را در منطقة «دايكندي» نشان مي‌دهد كه شورـ‌وـ‌شوق شناختن بر سر دارند؛ آن‌ها به مكتب مي‌روند تا به فرهنگِ مسموم و كشندة تاريخيِ اين سرزمين پايان دهند. اين صحنه ديدني است: گروهي از دختران، در يكي از محروم‌ترين منطقة جهان، همچون كبوترانِ سپيد بال، براي پايان‌دادن به محروميتِ شان، با پاي پياده در ميان گردـ‌وـ‌خاك شتابان به سوي مكتب پر مي‌گشايند. آيا اين جمع مستانِ سپيدپوش دخترانِ دانش‌آموزند، يا شكوفه‌هاي سپيد «بادام» در اين تپة خاكي مي‌رقصند؟ «رهروانِ پاكِ راه آيين» مستان و رقصان به معبد اگاهي مي‌روند تا ديگر زهرِ زهرها جان و روح ما را آلوده نسازد . با ديدنِ اين تصوير از يك‌ سو اشتياق ما مي‌شكفد، زيرا حس مي‌كنيم گل‌هايي تازة بر «خاكِ ‌عقيم» اين سرزمين رسته‌اند و از سوي ديگر، لشكرِ غم برما هجوم مي‌آورد، زيرا اين گل‌هاي سپيد پيش از آن‌كه بشكوفند مي‌پژمرند و محو مي‌شوند همچون سايه‌هاي كمرنگِ شان در خاك‌ها. در يك‌سو شكوفه‌هايِ سپيد بر فرازِ بلند ترين تپه‌هاي جهان شادان به معبدِ آگاهي روان‌ اند، در سوي ديگر در پشتِ پردة تيره‌ـ‌وـ‌تارِ اين شب‌هاي سياه فرهنگ، ديوان و دَدان صف كشيده‌ـ‌اند كه مست از شرابِ ناداني، اين «زهرِ زهرها». چاره چيست؟ براي بيرون رفت از اين ظلمتِ عظيم تنها يك راه وجود دارد: برافروختنِ مشعلِ تابناكِ آگاهي، راهي كه اين كبوتران سپيد بال در پيش گرفته‌اند. اين راه با همة سختي‌ها دشواري‌هايش سرانجام به «آگاهي» و «آزادي» خواهد رسيد. &lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=lead1 dir=rtl align=justify&gt; &lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Tue, 18 Nov 2008 13:13:18 GMT</pubDate>
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<title>زبان فارسي در زادگاه خود نمي ميرد</title>
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<description>&lt;P align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.freewebs.com/gull_baran/dari.jpg&quot; border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#0033ff size=3&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#0033ff size=3&gt;&lt;STRONG&gt;من آنم كه در پاي خوكان نريزم&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#0033ff size=1&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#0033ff size=3&gt;&lt;STRONG&gt;من اين قيــمت دُر لفـظ دري را&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#0033ff size=1&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT color=#0033ff&gt;&lt;STRONG&gt;&quot;ناصر خسرو قبادياني&quot;&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;به گزارش بی بی سی : در حالی که زبان اکثریت مردم افغانستان فارسی است وزیر اطلاعات و فرهنگ افغانستان یک خبرنگار و دو مدیر مسئول خبر را به علت “استفاده از واژه های فارسی” در بلخ و کابل مجازات کرده است.&lt;BR&gt;عبدالکریم خرم، وزیر فرهنگ افغانستان، در حکمی خطاب به تلویزیون محلی بلخ دستور داده است که بصیر بابی، گزارشگر محلی برای تلویزیون ملی افغانستان در مزارشریف، به علت “استفاده از کلمات خلاف اصول فرهنگی و اسلامی” برکنار شده و در سابقه کاری اش این “تخلف” تذکر داده شود. بصیر بابی در گزارشی برای تلویزیون ملی افغانستان که از کابل پخش می شود، واژه “دانشکده” را به جای “پوهنحی” و دانشگاه را به جای “&lt;A title=پوهنتون href=&quot;http://7tir.com/&quot;&gt;پوهنتون&lt;/A&gt;” استفاده کرده بود. وی همچنین “دانشجویان” را به جای “محصلین” بکار برده بود. آقای بابی در گفتگو با بی بی سی این اقدام وزیر اطلاعات و فرهنگ را غیرعادلانه و بدور از انصاف خواند و گفت: “این حکم نشان می دهد که وزیر فرهنگ تحمل ندارد افغانها زبان مادری خود را بکار ببرند و صدای ما را می خواهد در گلو خفه کند.” خبرنگار برکنار شده تلویزیون افغانستان افزود: “مجازات به جرم استفاده از زبان مادری ام، مضحک و خنده آور است.” اما مقامات وزارت فرهنگ افغانستان گفته اند که آقای بابی خواسته که “قصدا” زبان بیگانه را در افغانستان مروج سازد.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;افغانستان زادگاه زبان فارسي &lt;BR&gt;افغانستان زادگاه زبان فارسي با قدمت 5هزار ساله است.&lt;BR&gt;سيداسحاق شجاعي داستان نويس و پژوهشگر با بيان اين مطلب مي افزايد: تا زمان پادشاهي نادر شاه و ظاهر شاه ،زبان فارسي تنها زبان رسمي وعمومي در كشور بوده است حتي احمد شاه ابدالي به عنوان اولين پادشاه در محافل رسمي پشتون به زبان فارسي سخن مي گفت و زبان پشتون به عنوان زبان قومي مطرح بود. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در زمان عبدالرحمان خان كتاب تاج التواريخ و در زمان امان الله خان سراج الاخبار و سراج التواريخ به عنوان معتبرترين كتاب هاي آن عصر به زبان فارسي نوشته مي شد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;تازمان نادر خان كاربرد زبان پشتون از مرزهاي قبيله‌اي فراتر نمي رفت. اما سياست‌هاي قوميتي باعث شد تا درسال 1343زبان پشتون در كنار زبان فارسي به عنوان دو زبان رسمي افغانستان شناخته شود. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اما آيا مشكل اساسي ،تداخل زبان فارسي با زبان پشتون تنها يك مسئله‌ي زباني است ؟ يا اينكه مطرح كردن مسئله ي زبان در افغانستان اهداف ديگري را به دنبال دارد؟ &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;تحريكات خارجي &lt;BR&gt;شجاعي با بيان اينكه زبان فارسي و آثارماندگارآن متعلق به ملت افغانستان است نه به يك قوميت خاص، مي گويد: حساسيت‌هايي كه از طرف برخي از سياستمداران كشور درمورد زبان فارسي اعمال مي شود ريشه در &lt;BR&gt;منافع غيرمرتبط به مسئله ي زبان ها دارد بطوريكه فارسي زبانان افغانستان در سه دهه‌ي اخير تجربيات بسيار تلخي درباره‌ي ورود واژگان بيگانه داشتند كه برخي از اين موارد ريشه در مسايل سياسي و حتي تاريخي دارد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وي توضيح مي دهد: برخي از كساني كه در مصادر قدرت تكيه زده اند تحت تاثير وضعيت برخاسته از خارج اقداماتي انجام مي دهند كه برخلاف منافع ملي افغانستان است. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;برخي كشور ها برقراري صلح و ثبات و شكل گيري وحدت ملي در افغانستان را با منافع خود در تناقض مي دانند به همين خاطر در شرايط حساس كنوني،مسئله ي زبان ها در افغانستان را وسيله ي كشمكش ها قرار مي دهند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;درافغانستان، امروزه براي مفاهيم نو آميزه اي از واژگان بيگانه استفاده مي شود و سياست آشفته‌سازي فارسي از سوي حكومت آن كشور همچنان ادامه دارد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;به عقيده‌ي محمد كاظم كاظمي صاحبنظردر ادبيات وزبان فارسي- از گذشته تاكنون فارسي ايران،زبان رسمي و بلا منازع كشوربوده است و به اين ترتيب هم تكليف حاكمان با آن روشن است وهم تكليف مردم وهمه در رشد و اعتلاي آن كوشيدند؛ و تغيير حاكميت ها نيز تغييري در اين روند ايجاد نكرده است ولي در افغانستان يك سياست رسمي ،ثابت و سراسري در برابر زبان فارسي وجود ندارد و اگر هم در مقاطعي وجود داشته حاكمان در جهت تقويت اين زبان تلاش نمي كردند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وي براين نكته باور دارد: ما فارسي زبانان افغانستان سردرگم مانده ايم و نتوانستيم تكليف خود را با زبان مادري روشن كنيم بطوريكه هنوز نمي دانيم –كه اين زبان را چه بناميم فارسي يا دري يا فارسي دري با اينكه در مراجع رسمي از فارسي دري سخن مي رود . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;دراينجا سوالي مطرح مي شود- باتوجه به اين نكته كه استفاده از زبان فارسي در مراجع رسمي كشور بسيار بااهميت بوده اما چه اتفاقي افتاده است كه امروز در مراجع رسمي بخصوص در مكاتبات اداري واژه هاي پشتو مورد استفاده قرار مي گيرد؟ &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در دانشنامه ي الكترونيكي ويكي پديا به زاويه ي ديگري ازاين موضوع اشاره شده است. &lt;BR&gt;بنوشته ي اين پايگاه اطلاع رساني&quot; بدليل سياست پشتون سازي حكومتي در افغانستان ،در متون اداري واژه‌هاي بسياري برزبان فارسي افغانستان تحميل شده است . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;تحميل واژه‌هاي نوپاي پشتو در نامه‌هاي اداري افغانستان به اندازه‌اي است كه رواني زبان فارسي در آن به خطر افتاده است . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;تعامل منطقي با زبان پشتو &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;كاظمي دركتاب &quot;هم زباني و.بي زباني &quot; ص 136 آورده است: يكي ديگر از امكاناتي كه فارسي زبانان افغانستان خواسته يا ناخواسته از آن برخوردارند تعامل با زبان پشتو است، پشتو مي تواند هم زيستي بسيار سالم با فارسي داشته باشد ما با برادران پشتون خود مراودات اجتماعي داريم كه لاجرم يك داد و ستد زباني را ايجاب مي كند . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وي در اين كتاب از وضعيت كنوني تعامل با زبان پشتو ابراز تاسف كرده است: تعامل ميان فارسي و پشتو ،همواره در هاله‌اي از مسايل جنبي سياسي وغير سياسي گم شده ودر نهايت كار بدان جا كشيده كه داد و ستد با اين زبان براي فارسي زبانان ناگوار شده است و اگر پشتو از مسير غير از حاكميت- بطور مثال- از مسير ادبيات – با فارسي وارد تعامل مي شد و داد و ستد ميان اين دو زبان ، اختياري و براساس نيازهاي طبيعي بود،چه بسا كه فارسي درموارد لزوم از پشتو نيز بهره‌هاي مفيدي مي برد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وي در اين كتاب تصريح كرده است: به هر حال امروز واژگاني از پشتو وارد فارسي افغانستان شده است‌. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;ولي ترديدي نمي توان داشت كه در بسياري موارد ، در فارسي معادل‌هاي بهتري براي اين واژگان وجود دارد . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;از طرفي نيز پشتو كلمات بسياري را از فارسي وام گرفته است؛ ولي تفاوت كار دراين است كه آنچه پشتو ازفارسي گرفته ،طبيعي و براساس ضرورت بوده و آنچه فارسي وام گرفته ، شكل رسمي و اداري داشته است و اين تعامل سالم و نيكو نيست و تصوراينست كه شكل‌هاي بهتري نيز براي آن وجود داشته باشد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;كاظمي در اين كتاب خاطر نشان كرده است: برخلاف تصور غالب ،ميزان واژگان دخيل از پشتو در فارسي افغانستان بسيار اندك است و صرفا به چند اصطلاح اداري و نظامي محدود مي شود. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وي در ادامه آورده است: ارتباط دادن مستقيم ضعف زبان فارسي به حاكميت پشتون كشور كمي بيجا به نظر مي رسد و ناشي از تعصبات رايج در كشور است. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;سيد اسحاق شجاعي -نويسنده با بيان اينكه زبان زنده و زاينده است مي افزايد: متاسفانه درفارسي افغانستان واژگان انگليسي ،عربي ،پشتو و اردو فراوان بكار رفته است و اين مسئله يكي از چالش‌هاي زبان فارسي ‌افغانستان است و رشد زبان فارسي را به خطر مي اندازد و بايد شرايطي را فراهم كرد تا زبان فارسي سير طبيعي تكامل خود را طي كند و تجربه نشان داده كه اقدامات تضعيف گرانه نمي تواند فارسي را دچار زوال كند همان طور كه مثنوي معنوي مولانا جلال الديين بلخي به عنوان شاهكار ادبي فارسي شهرت جهاني دارد ونمي توان آن را نابود يا تضعيف كرد. &lt;BR&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 02 Nov 2008 13:58:18 GMT</pubDate>
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<item>
<title>نقش معادن و ذخایر زیرزمینی در اقتصاد و امنیت افغانستان </title>
<link>http://labkhandefarda.blogfa.com/post-54.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl align=justify&gt;  &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.ngdir.com/Data_Pub/News/Pics/33674_2.jpg&quot; align=baseline border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   افغانستان به دنبال رشد و توسعه اقتصادی می باشد يكي از مهمترين و اساسي‌ترين پايه‌هاي اقتصاد هركشوري منابع معدني و ذخاير تحت الارضي آن كشور است. بطوريكه اگر كشوري از منابع تحت الارضي مناسب و كافي برخوردار نباشد با قاطعيت مي‌توان گفت آن كشور هرگز راه توسعه را نخواهد پيمود زيرا الفباي اقتصاد را در اختيار ندارد بنابراين نقش معادن و منابع در رشد اقتصادي هر كشوري انكار ناپذير است.بدون تردید بهره برداری از معادن کشور، یک عامل کاملا مثبت و مهم در رشد و توسعه اقتصادی است. و در عین حال به شدت با کمبود سرمایه روبه رو است که برای رسیدن به توسعه اقتصادی، بهره برداری از معادن کشور می تواند یکی از بهترین راه ها باشد.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;  پس از سقوط طالبان افغانستان با پیش رفت هایی در برخی زمینه ها همراه شد، که احیای مجدد نهادهای سیاسی و اجتماعی و تصویب قانون اساسی کشور را می توان از مهم ترین این پیش رفت ها برشمرد اما متأسفانه در مسایل متعدد دیگر با مشکلات جدی مواجه شد. &lt;BR&gt;   بدون شک یکی از این مشکلات، وجود روزافزون بی ثباتی و ناامنی در سطح کشور می باشد، که عامل آن نیز مشخصاً تروریزم ، فقر، بیکاری وعدم راه اندازی پروژه های کلان ملی مانند استخراج معادن وکمک گیری در زمینه از سرمایداران بزرگ جهانی است چنان که این مسئله، مانع بزرگی در مقابل فعالیت های انکشافی و اقتصادی افغانستان محسوب می گردد.بهره برداری از معادن افغانستان که تا به حال دست نخورده باقی مانده، نیازمند زیرساخت ها، ثبات و یک نظام  سیاسی مقتدر است و بدون هر کدام از این گزینه ها، به صراحت می توان گفت که بهره برداری از معادن و رسیدن به رشد و توسعه اقتصادی محال خواهد بود و در دوره های گذشته نیز یکی از عوامل عمده در عدم توسعه اقتصادی، فقدان نظام سیاسی مناسب بوده است. اینک و بعد از گذشت 7 سال، هنوز در کشور شرایط لازم و امکانات ساختاری برای تأمین رشد مداوم دیده نمی شود و همین امر یکی از چالش های عظیم و قابل ملاحظه ای می باشد که باعث شده تا افغانستان هنوز در زمره فقیر ترین کشورهای دنیا قرار گیرد. در اولویت های سرمایه گذاری در افغانستان که از عمده ترین آن ها می توان به بخش زراعت و معادن اشاره کرد، تا به حال و بعد از گذشت 7 سال، سرمایه گذاری و بهره برداری صورت نگرفته است.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;  در مورد منابع زیرزمینی افغانستان، گفته های زیادی مطرح است که حاکی از واقعیت های موجود است .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   محمدابراهیم عادل، وزیر معادن کشور می گوید: گام های نخست و مؤثر در استخراج و انکشاف معادن کشور اخیراً برداشته شده و تا به حال صدها ساختمان نفت و گاز در شمال کشور کشف شده است و افغانستان به استثنای الماس، دارای تمام انواع فلزات و معدنیات می باشد.&lt;BR&gt;   با وجود این که بهره برداری از معادن کشور، به گفته وزیر معادن، تنها راه آبادانی کشور محسوب می گردد اما در طول سال های جنگ و بعد از آن، کم ترین فعالیت ها، در این عرصه بوده و در مدت این سال ها، فرصت های زیادی برای بهره برداری معادن کشور از دست رفته است.&lt;BR&gt;   یکی از راه های انکشاف و استخراج معادن در کشور جذب سرمایه گذاران خارجی و سکتور خصوصی داخلی است. فعالیت سرمایه گذاران خارجی در افغانستان یک عامل مثبت در جهت رشد و توسعه اقتصادی است. چرا که مهم ترین موانع در استخراج و بهره برداری از معادن کشور، کمبود سرمایه و عدم وجود تکنالوژی مدرن می باشد و شرکت های خصوصی با سرمایه خود می توانند به رفع این موانع کمک شایانی کرده و سرمایه گذاران خارجی نیز با فعالیت های خویش سهم بارزی در انتقال شیوه های نوین مدیریت صنعتی در کشور داشته باشند. &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;   به طور كلي ذخاير معدني افغانستان را مي‌توان در چهار گروه مواد معدني تقسيم بندي نموده و بررسي كرد كه ذيلاً به طور كلي بدان پرداخته شده است.&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;1-  ذخاير معدني فلزي ( كانسارها فلزی)&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;2-  ذخاير نفت و گاز&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;3-   ذخاير معدني غير فلزي&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;4- ذخاير سنگهاي قيمتي&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   آری به حقیقت بهره برداری و استفاده از منابع طبیعی و ذخایر معدنی کشور، می تواند در اقتصاد کشور دگوگونی عمیقی ایجاد کند و اوضاع نابه سامان اقتصادی افغانستان را به سوی شکوفایی و رشد رهنمون شود.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   با یک سروی که از سوی سروی جیولوژی آمریکا صورت گرفت، معلوم شد که افغانستان فعلا یکی از ثروت مندترین کشورهای جهان از لحاظ ذخایر معدنی است.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   بر اساس این سروی، افغانستان دارای 500 تریلیون دالر ذخایر معدنی است که می توان تصور نمود که در صورت بهره برداری مناسب و منطقی از این معادن، افغانستان به قطبی اقتصادی در منطقه تبدیل خواهد شد اما این امر مستلزم کار و فعالیت بسیار و پلان ها و برنامه های دقیق و مؤثر و مدیریت اصولی و هوشمندانه است.                              &lt;BR&gt;   از طرف دیگر بتازگی مقامات وزارت معدن وصنايع کشور از کشف سه معدن بزرگ در کشور خبر داده اند . وزير معادن وصنايع کشور چندي پيش به منظور بررسي وضعيت معادن و مردم مناطق مرکزي کشور به ولايات باميان،غور، دایکندی، پروان و بغلان سفر ١٣روزه انجام داده بود.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   انجينير محمد ابراهيم عادل وزير صنايع و معادن کشور  با رسانه ضمن اظهار کشف ذخایر ومعادن درکشور گفت است: ((در سفر به ١٥ ولسوالي و مراکز ولايات مرکزي ما توانستيم ٣ معدن بزرگ را کشف نماييم.))&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   وزير صنايع و معادن در مورد نوعيت و موقيت اين معادن اظهار داشت که قطعات ذغال سنگ با کيفيت بسيار عالي در ولسوالي يکاولنگ ولايت باميان به ضخامت ٣ متر در ساحه حدودآ٨٠ تا ١٠٠ کيلومتر و ساحات سنگ آهن به ارتفاع ٥٠٠ متر و ضخامت حدودا ٥٠ تا ١٠٠ متر و همچنان معدن مس در ولسوالي شيخ ميران ولايت دايکندي رويت گرديده است .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000000&gt;  همچنان وی افزود که مردم افغانستان می توانند برای صدها سال از این معادن استفاده نمایند، وزارت معادن جهت تثبیت نهایی معادن مذکور مصروف آماده سازی اسناد داوطلبی می باشد که درصورت استخراج آنها حدود یک میلیارد دالر عاید دولت افغانستان می گردد.&lt;BR&gt;  گفتنی است برنامه استخراج معدن مس عینک در ولایت لوگر توسط یک شرکت چینی آغاز شود و تا ۷۰ سال آينده استخراج آن می تواند ادامه داشته باشد، که یکی از بزرگترین معادن مس در سطح جهان بوده و سالانه بیش از چهارصد میلیون دلار عاید دولت می شود.&lt;BR&gt;گفته می شود پروژه استخراج معدن آهن &quot;حاجی گگ&quot; نیز به یکی از شرکت های خارجی سپرده شود که با آغاز به کار اين معدن برای بيش از ۴ هزار نفر زمينه کار فراهم می گردد. &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000080&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 02 Nov 2008 06:57:18 GMT</pubDate>
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<item>
<title>بیایید امپراطورانه بیندیشیم</title>
<link>http://labkhandefarda.blogfa.com/post-53.aspx</link>
<description>&lt;P align=center&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.world-hazaras-net.blogfa.com/Photo/w/world-hazaras-net.jpg&quot; align=baseline border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;* &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;یک &lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;گدا&lt;/SPAN&gt; از لقمه ای به لقمه ی دیگر می اندیشد .&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;&lt;SPAN dir=ltr style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;?XML:NAMESPACE PREFIX = O /&gt;&lt;O:P&gt;&lt;/O:P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;* یک &lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;کارگر&lt;/SPAN&gt; از روزی به روز دیگر .&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;O:P&gt;&lt;/O:P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;* یک &lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;کارمند&lt;/SPAN&gt; از سالی به سال دیگر .&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;O:P&gt;&lt;/O:P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;اما &lt;FONT color=#cc0000&gt;... &lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT color=#cc0000&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;O:P&gt;&lt;/O:P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;           &lt;FONT color=#ff0000&gt;* &lt;/FONT&gt;یک &lt;SPAN style=&quot;COLOR: red&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;امپراطور&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt; به یک قرن می اندیشد&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt; . &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;*&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=center&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;FONT size=3&gt;                          &lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=2&gt; &quot; ضرب المثل شرقی &quot;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=left&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;                               &quot;&lt;/FONT&gt; افغانستان زنده و بیدار است چون مردمی زنده و بیدار دارد &lt;FONT color=#ff0000&gt;&quot; &lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl style=&quot;DIRECTION: rtl; unicode-bidi: embed; TEXT-ALIGN: right&quot; align=left&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA style=&quot;FONT-SIZE: 10pt; FONT-FAMILY: Tahoma&quot;&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 23 Oct 2008 11:45:18 GMT</pubDate>
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</item>
<item>
<title>افغانستانی ها بابت افغانستانی بودن شان باید بهای سنگینی را بپردازند !!!!</title>
<link>http://labkhandefarda.blogfa.com/post-52.aspx</link>
<description>&lt;P align=center&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.afghanan.se/all_picture/mapp.jpg&quot; align=baseline border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=center&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;در یک وب گردی ساده گذرم به وبلاگ &lt;STRONG&gt;&quot;کبوتر خوان&quot;&lt;/STRONG&gt; افتاد، چشمم به مطلبی دوخته شد که سخت مرا متاثر نمود شما هم این مطلب را بخوانید حتما متاثر خواهید شد و از خودتان سوال خواهید کرد که چرا انسان های به جرم افغانی بودن نه در کشورش آرامش دارد و نه در خارج از کشور!!!! و بهای این همه ظلم و اجحاف که به حق این مردم ستمدیده روا داشته می شود را چه کسی باید بپردازد!!!! &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;یک حادثه و دو حاشیه&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;I&gt;حادثه&lt;/I&gt;: ساعت یک بامداد پنجشنبه 31 مرداد (اسد) سال جاری 1387 بر اثر واژگون شدن یک دستگاه کامیون حامل 113 افغانی جویای کار که به صورت قاچاقی وارد ایران می­شدند، سی نفر از آنان در دم جان باختند و حدود 80 نفر دیگر که برخی از آنها جراحات سختی داشتند، به بیمارستان منتقل شدند. یک یا دو نفر نیز بر اثر شدّت جراحت، در راه جان باختند. محل وقوع حادثه، جادۀ شیرازـ ارسنجان در استان فارس (جنوب ایران) بوده است. آن 113 نفر توسط قاچاقچیان انسان در داخل یک کامیون و زیر بارها، جاسازی و به مدت چهار شبانروز از مرز شرقی ایران تا جنوب این کشور، در راه بودند. رادیوی ایران در اخبار نیم­روزی پنجشنبه 31 مرداد، خبر را به صورت کوتاه و گذرا نشر کرد؛ اما در بخش­های بعدی مانند اخبار شبانگاهی صدا و سیما، گزارش یا خبری از این حادثه پخش نشد و در اسرع وقت بایگانی گردید. آنچنان سکوت سنگین رسانه­ای و خبری حاکم گردید که سرانجام ما نفهمیدیم چه تعداد از مجروحان حادثه در بیمارستان درگذشتند و سرنوشت جان بدر بردگان و تکلیف اجساد جان باختگان چه شد. گویا سی رأس بز یا گوسفند در حادثه­ای کشته و هشتاد رأس دیگر مجروح شده­اند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;اما علی­رغم سکوت سهمگین و عامدانۀ رسانه­ای و خبری حاکم در قبال این حادثه دلخراش در ایران و با وجود برخورد نادیده­انگارانۀ مقامات جمهوری اسلامی ایران ـ که کشور خود را ام­القری جهان اسلام می­خوانند و ادعای رهبری جهان اسلام را دارند ـ ؛ برخی از وجدان­های بیدار در این سرزمین در برابر آن سکوت شوریدند. یکی از آنها &lt;I&gt;دکتر صادق زیباکلام&lt;/I&gt; استاد دانشگاه تهران و روشنفکر سرشناس ایرانی بود. وی با نگارش مقاله کوتاه و پرمحتوایی تحت عنوان &lt;I&gt;«چرا سکوت خبری؟»&lt;/I&gt; در روزنامه اصلاح طلب «&lt;I&gt;اعتماد ملی&lt;/I&gt;» (شماره 724 مورخ 5 شهریور 1378) حقایق ناگفته­ای را پیرامون حادثۀ یادشده، مورد اشاره قرار داد. مقاله مذکور تنها صدایی بود در آن سکوت عامدانه و معنادار. ما در اینجا متن آن مقاله را بدون هیچ­گونه دخل و تصرف، به عنوان «حاشیه اول» بر آن حادثه، نقل می­کنیم:&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;I&gt;حاشیه اول&lt;/I&gt;:                          &lt;STRONG&gt;چرا سکوت &lt;/STRONG&gt;                   صادق زیبا کلام&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; خبر خیلی کوتاه بود. کامیونی حامل 113 افغانی که به صورت قاچاق از مرز سیستان و بلوچستان وارد ایران شده بودند، بین شیراز و ارسنجان واژگون می­شود، 30 نفر در جا کشته شده­اند، یکی دو نفر در راه کشته می­شوند و مابقی ـ قریب به 80 نفرـ به بیمارستان­های شیراز منتقل می­شوند. با اینکه 30 انسان کشته شده بودند و شمار بیشتری به دلیل وخامت جراحات­شان ظرفی یکی، دو روز آینده می­مردند؛ اما تمامی اخبار مربوط به این تراژدی ظرف چند ساعت از فهرست اخبار خبرگزاری­ها، سایت­ها، مطبوعات و سایر رسانه­های جمعی ایران کنار گذارده شد. دلیل آن هم واضح است؛ قربانیان افغانی بودند. نه کسی برای آنان گریست، نه کسی به بیمارستان­های شیراز شتافت که خون اهدا کند، نه کسی برای بازماندگان اظهار تأسف کرد، نه کسی خواست بداند که اصلاً آنها کی بودند، چند ساله بودند، مجرد بودند یا متأهل، فرزند یا فرزندانی،  پدر و مادرانی، همسر و همسرانی یا خانواده­هایی منتظر بازگشت آنان و شنیدن خبری از سلامت آنان بودند یا نه. مسؤلان و مقامات کشورمان اجمالاً آنان را در نزدیکی گورستانی که 18، 19 نفر از هموطنان­شان را که در  جریان فروریختن ساختمانی در سعادت آباد تهران قریب به یکماه پیش دفن کرده بودند، سریعاً به خاک سپردند و شب هم بازگشتند به میان خانواده­ و فرزندان­شان. انسان دلش از اینهمه بی­کسی و غریبی افغان­هایی که مجبور می­شوند به ایران پناه بیاورند، به درد می­آید. انسان­هایی که که محروم ترین و فقیرترین ها هستند، باید 500 هزار تومان یا حتی بیشتر به قاچاقچیان بدهند تا آنان را از مرز عبور داده، از ایستگاه­های متعدد ایست و بازرسی نیروی انتظامی بگذرانند، درحالی که بیش از یکصد نفر از آنان هم­چون ماهی ساردین زیر انبوهی از چادر و بار به همدیگر چسپیده­اند و به سرنوشت نامعلوم و عزیزانی که پشت سر گذاشته­اند فکر می­کنند و پس از رسیدن به مقصد درکاری سخت که بیشتربه جان کندن می­ماند، با اجرتی حول و حوش چند هزار تومان که قسمت عمده آن را هم برای خانواده­شان در افغانستان می­فرستند، مشغول می­شوند. نه بیمه هستند، نه از خدمات درمانی برخوردارند، نه مشمول هیچ حقوق صنفی و کارگری­ای می­شوند، نه از هیچ حقوق شهروندی و مدنی­ای بر خوردارند و نه هیچ مرجع، مقام، سازمان و Ngo، حاضر است پناهی به آنان داده و دست­کم به درد دلشان  گوش دهد. همه اینها به کنار، هرازگاهی هم مقامات ایرانی برای مبارزه با بیکاری، قاچاق مواد مخدر، اعتیاد، سرقت و سایر جرم­های اجتماعی، سروقت این بخت­برگشتگان رفته و آنان را گروه گروه جمع کرده، به مرز برده و هم­چون یک محموله به آن طرف پرتاب می­کنند. بدون در نظر گرفتن هرگونه ملاحظه اخلاقی و انسانی در باره خانواده، زن و فرزند و سایر وابستگان آنان در ایران. مثل سایر سیاست­ها و تصمیم­ها پس از مدتی مسأله جذابیت خبری خود را از دست می­دهد و دیگر نان و آبی خبری و رسانه­ای برای آن مسؤل فراهم نمی­کند. آب ها از آسیاب می­افتد و اخراجی­ها مجدداً وارد ایران می­شوند. از سیاست­های مبارزه با مهاجران غیر مجاز افغانی در ایران، نه خود ما ایرانی­ها سودی می­بریم، نه کشور ما خیری عایدش می­شود و نه کمکی به ملت، کشور و مهاجران بی­پناه افغانی می­شود. ایران نه تنها سودی نمی­برد که هیچ، هر بار هم که موج بگیر بگیر افغانی­ها را به راه می­اندازیم، کلی هم مجامع و محافل بین المللی به ما ایراد می­گیرند که حقوق بشر را زیر پا گذارده­ایم، در چارچوب عهد و میثاق­های سازمان ملل در خصوص پناهنده­ها عمل نکرده ایم و ... فی الواقع تنها کسانی که از سیاست­های مسؤلان ما در قبال مهاجران افغانی سود می­برد، قاچاقچیان هستند. در همه جای دنیا از جمله در بلاد استکباریه، مهاجرت تابع یک ضوابط و قواعدی است. میلیون­ها ایرانی­ای که ظرف سه دهه گذشته به غرب مهاجرت کردند یا پناهنده شدند، صرف نظر از آنکه قانونی رفتند یا غیر قانونی، بالاخره پس از مدتی تکلیف­شان روشن شده و کشور میزبان آنان را به عنوان پناهنده می­پذیرد. از زمانی که آنان به عنوان پناهند پذیرفته می­شوند، از یک حق و حقوق مدنی­ای برخوردار می­شوند. این طور نیست که اگر وزیری یا مسئولی هوس کرد، ایرانی­ها را از انگلستان یا سوئد اخراج کند، موج بگیر بگیر به راه بیفتد و ایرانی­ها را گله گله به مرز ببرند و از کشور خارج کنند.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;اما در ایران یک پناهنده افغانی حتی اگر 20، 30 سال هم زندگی کرده و زن و بچه هم داشته باشد، در موج بعدی که این یا آن مسوول و این یا آن اداره دولتی ایران به راه می­اندازد، ممکن است از کشور اخراج شود. بماند اینکه افغان­ها هم­کیش و هم­آیین و هم­زبان ما هستند، در حالی که یک ایرانی معلوم نیست چه سنخیتی با یک سوئدی، دانمارکی، انگلیسی، کانادایی یا امریکایی دارد. فرزند یک ایرانی که غیر قانونی وارد انگلستان یا آلمان شده یا غیر قانونی در آنجا مانده، بهرحال می­تواند به مدرسه برود و از بهداشت و درمان رایگان هم برخوردار است. اما کم نیستند افغان­هایی که آموزش و پرورش جمهوری اسلامی ایران جلوی ثبت نام و تحصیل فرزندان­شان را گرفته یا از آنان مطالبه شهریه­های گزاف می­نماید.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;افغان­هایی که در حوالی روستای خیاره در جاده ارسنجان ـ شیراز جان باختند، 4 شبانه­روز در زیر چادر و زیر بارهای کامیون مخفی شده و در راه بودند. نمی­دانم چه کسی به بستگان آنها در مزار شریف، بغلان، ترمذ یا قندوز اطلاع داد که عزیزشان در ساعت یک بامداد پنجشنبه 31 مرداد بر اثر واژگون شدن کامیونی که او را حمل می­کرد، در میان بارها له شده و منتظر خبری از وی پس از رسیدن به اصفهان یا تهران و ارسال پول نباشند؛ اما می دانم به جای آن 113 افغانی که 30 تن از آنان آنچنان مظلومانه له شدند، اگر خدای ناکرده، زبانم لال و من نباشم که آنروز چنین فاجعه­ای را ببینم، قوزک سرناخن شست پای یک فرانسوی، امریکایی، انگلیسی یا ژاپنی آسیب دیده بود، روزهای متوالی آن خبر در صدر رسانه­های بین المللی بود. اما برای برخی از ما خیلی مهم نیست که چرا و چگونه مردیم، چرا که بقول شاعر درد و رنج، پروین اعتصامی، «زندگی کردن من مردن تدریجی بود». زندگی 30 تن افغانی که پنجشنبه شب آنگونه غم­انگیز در جاده مخروبه شیراز به ارسنجان به پایان رسید، یک جورهایی «مردن تدریجی» بود. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;I&gt;حاشیه دوم&lt;/I&gt;:               &lt;STRONG&gt;دولت مسئول و حقوق شهروندی!&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; علی­رغم اینکه آن 113 انسان نیگون­بخت در عرف دولت و مردم ایران با عناوین مجرمانه­ای چون «اتباع غیر مجاز بیگانه» و «بیگانگان مجرم و متجاوز» شناخته می­شوند و بر این اساس، مرگ و جرح آنها، احساسی را در این دیار جریحه­دار نمی­سازد؛ با اینحال حداقل دل یک انسان «از اینهمه بی­کسی و غریبی افغان­ها به درد می­آید» و قلمش به طپش می­اُفتد؛ اما بی­نهایت عجیب، دردآور و خجالت­آور اینکه در آنسوی مرز و در میان هموطنان این تیره­بختان، هیچ دلی به درد نمی­آید و هیچ قلمی بر غربت و سیه­روزی آنان اشک نمی­ریزد. دولتِ به اصطلاح مسئول و منتخبِ مردم افغانستان از قتل و جرح 113 تن از شهروندانش در دیار غربت، خم به ابرو نمی­آورد. گویا ملت، دولت، دستگاه روابط خارجی و اصحاب رسانه و مطبوعات افغانستان جملگی به خواب زمستانی فرو رفته­اند. نه کسی از ابعاد این حادثه و فاجعه سخن می­گوید، نه ریشه­ها و بسترهای بروز آن بررسی می­شود، نه برای جان­باختگان ابراز تأسف می­ گردد و نه به خانواده­های داغدارشان تسلیت گفته می­شود و ...گویا ما افغان­ها عادت کرده­ایم که تنها برای قربانیانی اشک بریزیم و آنها را مهم و انسان بشماریم که در بمباران ارتش شوری (سابق) یا ارتش امریکا کشته شوند. &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;میزان و مقدار ارج و منزلت قربانیان ما بستگی به میزان قدرت و هیمنۀ کشندگان آنها دارد. نمی­دانم بمب­ها و موشک­های امریکا و شوروی چه اعجازی دارند که ما را مستقیم به بهشت می­برند و صاحب صدها کرامت و فضیلت می­سازند؛ اما قربانیان ما در سایر حوادث، جنازه­ها شان نصیب گرگ و زاغ می­شود و سرنوشت غمبارشان برای هیچ­کس مهم نیست.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;براستی اگر دولت افغانستان و دستگاه روابط خارجی­اش در قبال این حادثه غم­انگیز مسئول نیست، پس چه کسی در زیر این آسمان کبود در برابر آن مسئولیت دارد؟ &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;آیا لازم نبود که سفیر جمهوری اسلامی افغانستان در تهران یا کاردار فارت و یا حداقل یک دپلمات درجه سه و چهار با حضور در محل حادثه، از مجروحان آن عیادت و نسبت به کشته شدن سی انسان بی­پناه، یک اظهار تأسف خشک و خالی می­کرد؟ آیا شناسایی و انتقال اجساد قربانیان به موطن و خانواده­های داغدارشان حداقل وظایف سفارت افغانستان در ایران و دستگاه روابط خارجی کشور نبود؟ آیا وزارت خارجه افغانستان در قبال مرگ و جرح 113 تن از اتباع کشور خود در بیرون قلمرو این سرزمین هیچ مسئولیتی ندارد؟ آیا انسان غیر مجاز ـ که به دلیل شدّت فقر و درماندگی و یافتن لقمه نانی برای خانواده­اش، ناچار تن به راه قاچاق و غیر مجاز داده است ـ از هیچ حقوق انسانی و مدنی­ای حتی در کشور خود نیز برخوردار نیست؟ آیا  حتی جنازۀ بی­جان آنها نیز مجرم و غیر مجازند و از حق شناسایی و انتقال به زادگاه شان محروم؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;وقتی دولت، دستگاه روابط خارجی و سفارت­خانه­ها (یا بهتر بگوییم غارت­خانه­ها) ی ما برای اتباع و شهروندان شان به اندازۀ مگس ارزش قایل نیستند، از کشور و دولت بیگانه­ای چون ایران چه انتظاری می­توان داشت؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT color=#000099&gt;منبع : وبلاگ مهاجر افغانستان&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 23 Oct 2008 11:31:18 GMT</pubDate>
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<item>
<title>مذاكره دولت كابل با طالبان</title>
<link>http://labkhandefarda.blogfa.com/post-51.aspx</link>
<description>&lt;P align=center&gt;&lt;FONT size=1&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt;&lt;IMG height=164 alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.avapress.com/images/docs/000002/n00002118-b.jpg&quot; width=215 align=baseline border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;رنگين دادفر سپنتا، وزير امور خارجه افغانستان امروز چهارشنبه براي اولين بار رسما اعلام کرد :كابل مذاکراتي را با نمايندگان طالبان در عربستان سعوي برگزار کرده است. وي در جمع خبرنگاران  در اسلام آبادگفت: فرايند آشتي در افغانستان موقعي مي تواند به جلو حرکت کند که نيروهاي طالبان سلاح هاي خود را زمين بگذارند، قانون اساسي افغانستان را بپذيرند و به شيوه مسالمت آميز زندگي کنند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وي که بعد از ديدار با همتاي پاکستاني خود، شاه محمود قريشي، گفت &quot;ما در ابتداي اين فرايند قرار داريم.&quot; وي از دادن توضيحات بيشتر در اين زمينه خودداري کرد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اظهارات سپنتا در حالي مطرح مي شود که سعود الفيصل، وزير امور خارجه عربستان سعودي روز گذشته تاييد کرد که رياض گفتگوهايي را بين دولت افغانستان و گروه طالبان ميزباني کرده است.&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Wed, 22 Oct 2008 18:28:18 GMT</pubDate>
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<title>با چشمانتان لبخند بزنید</title>
<link>http://labkhandefarda.blogfa.com/post-50.aspx</link>
<description>&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.aftab.ir/lifestyle/images/506ff83559ae096c204300a0fd4e5b92.jpg&quot; align=baseline border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;لبخند زدن ، خود ما و دیگران را دلگرم می کند. با فراگیری نشاندن یک لبخند دوستانه و گرم که باعث احساس بهتر در وجود ما می شودکسانی را که ما را می بینند شاد می کند ، قادر خواهیم بود بر شادمانی جهان بیفزائیم. جایگزینی یک ظاهر تلخ با لبخند به نفع همه است. پس این تکنیک را بکار ببندید و بطور طبیعی لبخند بزنید. اما چگونه باید این کار را انجام دهید: &lt;BR&gt;- لبخند با چشم آغاز می شود. به بارقه و احساس خوشی در چشمانتان توجه کنید. &lt;BR&gt;- توجه داشته باشید که چگونه با آمدن لبخند به چشمانتان ، آنها بطور طبیعی حرکت می کنند. &lt;BR&gt;- به لبخند با دهانتان اکتفا نکنید چرا که تنها نوعی تظاهر است. &lt;BR&gt;- هنگامی که با چشمانتان لبخند می زنید ، این حالت گسترش می یابد و طبیعتا یک لبخند واقعی بر دهانتان نقش می بندد. &lt;BR&gt;- پرتو لبخند را باچشمانتان ساتع کنید و بقیه صورت را بدون حرکت نگه دارید تا آنگاه که یک لبخند گرم و دوستانه بر آن بنشیند. &lt;BR&gt;این روش را بیاموزید و تمرین کنید تا دریابید که چگونه شما را در نظر دیگران محبوب تر می سازد. &lt;BR&gt;● زیبائی را جذب کنید! و با چشمانتان لبخند بزنید! &lt;BR&gt;لبخند زدن ، خود ما و دیگران را دلگرم می کند. با فراگیری نشاندن یک لبخند دوستانه و گرم که باعث احساس بهتر در وجود ما می شود و کسانی را که ما را می بینند شاد می کند ، قادر خواهیم بود بر شادمانی جهان بیفزائیم. جایگزینی یک ظاهر تلخ با لبخند به نفع همه است. پس این تکنیک را بکار ببندید و بطور طبیعی لبخند بزنید. &lt;BR&gt;● اما چگونه باید این کار را انجام دهید: &lt;BR&gt;- لبخند با چشم آغاز می شود. به بارقه و احساس خوشی در چشمانتان توجه کنید. &lt;BR&gt;- توجه داشته باشید که چگونه با آمدن لبخند به چشمانتان ، آنها بطور طبیعی حرکت می کنند. &lt;BR&gt;- به لبخند با دهانتان اکتفا نکنید چرا که تنها نوعی تظاهر است. - هنگامی که با چشمانتان لبخند می زنید ، این حالت گسترش می یابد و طبیعتا یک لبخند واقعی بر دهانتان نقش می بندد. &lt;BR&gt;- پرتو لبخند را باچشمانتان ساتع کنید و بقیه صورت را بدون حرکت نگه دارید تا آنگاه که یک لبخند گرم و دوستانه بر آن بنشیند. این روش را بیاموزید و تمرین کنید تا دریابید که چگونه شما را در نظر دیگران محبوب تر می سازد. &lt;BR&gt;زیبائی را جذب کنید! و با چشمانتان لبخند بزنید! &lt;BR&gt;● نمایش شگفت انگیز زندگی! &lt;BR&gt;گاهی اوقات (کی گفت همیشه؟) زندگی مانند یک نمایش شگفت انگیز و پر احساس یا یک کمدی است. اما آیا هرگز تصور کرده اید چه چیز آن شبیه به بازی کردن در یک نمایش جالب یا کمدی است؟ بازیگران برای اینکه خنده دار بنظر آیند خود را در موقعیت ها و حالت های اسف باری قرار می دهند. آنها مجبورند این کار را بارها و بارها تکرار کنند تا زمانی که آن را درست ایفا نمایند. آنها خسته ، بد اخلاق و از کار زده می شوند. اما بعدا می توانند در میان تماشاچیان بنشینند و نمایش را تماشا کنند و بخندند. &lt;BR&gt;شاید این کار در زمان انجام ، خسته کننده و دشوار باشد اما کاری است که در گذشته انجام شده و اکنون آنها جزء بینندگان تلقی می شوند و می توانند بخندند. &lt;BR&gt;حال ممکن است ما آنقدر در زندگی در گیر شده باشیم که فراموش کنیم بعنوان تماشاچی صندلی را بگیریم و سوی دیگر ماجرا یعنی قسمت طنز آمیز آن را ببینیم. شاید شما الآن نخندید اما ارزشش را دارد که به عقب برگردید ، بازی خود و دیگران را در این نمایش خنده دار تماشا کنید. بیاد داشته باشید این نمایش کمدی ، بسیار جدی است!&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 06 Oct 2008 18:56:03 GMT</pubDate>
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<item>
<title>با لحظه ها زندگی کنیم</title>
<link>http://labkhandefarda.blogfa.com/post-49.aspx</link>
<description>&lt;P align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; hspace=0 src=&quot;http://www.aftab.ir/lifestyle/images/091d99fb920e4c25cc49addf255148db.jpg&quot; border=0&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;تصور کنید اگر ما بتوانیم با لحظه لحظه عمرمان واقعا زندگی کنیم، آنها را حس کنیم و جدی بگیریم و هر پیشامدی را فرصتی برای ایجاد تغییر و دگرگونی مثبت در زندگی بدانیم &lt;BR&gt;و بپذیریم در برابرهر مشکلی تنها یک راه بیشتر نداریم و آن هم ایستادگی و تلاش برای پیدا‌کردن راه‌‌ حل مناسب است؛ چه شور و حالی برای ادامه زندگی نصیب خود می‌کنیم ... &lt;BR&gt;این روش، همان متوقف کردن کامل افکار منفی و در نهایت، مثبت‌اندیشی است. اما نفی افکار منفی به این معنا نیست که با تمرکز بر این موضوع و آن چه نمی‌خواهیم که همان افکار منفی محسوب می‌شوند در واقع به جذب این نوع افکار بپردازیم.&lt;BR&gt;چون مهم این است که بر چه مسایلی تمرکز می‌کنیم اگر‌چه مرحله نفی و توقف باشد. زیرا موضوع این نیست که می‌خواهیم سعی کنیم افکار منفی را متوقف یا کنترل کنیم و یا اساسا به زور آنها را از خود دور کنیم.‌ به هر حال نتیجه یکسان است چون تمرکز ذهن بر افکار منفی است و بنابر قانون جذب، به این طریق شما در واقع از افکار منفی برای حضور در ذهن‌تان بیشتر دعوت می‌کنید. &lt;BR&gt;این واقعیت خیلی ساده و آسان عمل می‌کند. به عبارت دیگر، توقف افکار منفی درست به معنای پرورش و بکار‌گیری افکار مثبت است؛ آن هم به شکل عمیق و قوی.&lt;BR&gt;ما با تمرین قدردانی از هر آن چه در طول روز به ما نیروی بهتر زندگی‌کردن می‌بخشد، هرچند بسیار محدود و اندک؛ در واقع می‌توانیم افکار مثبت را در ذهن خود شکل دهیم.&lt;BR&gt;قدردانی برای سلامتی، خانه، شغل، غذا، پوشاک، خانواده، دوستان و هر آن چیزی که به نوعی به ما تعلق دارد و از آن‌ها بهره مند می‌شویم.تشکر برای همه چیز، ریز و درشت.&lt;BR&gt;هر زمان که ما می‌گوییم &quot;متشکرم&quot; ، این به مفهوم یک تفکر عمیق خوب و مثبت است. به این ترتیب ما بیشتر و بیشتر افکار مثبت را در ذهن خود می‌پروریم و افکار منفی را پاک می‌کنیم.&lt;BR&gt;زیرا در واقع تمرکز ما دیگر بر افکار مثبت است و قانون جذب، به این طریق، بیشتر برای دعوت از افکار مثبت، عمل می‌کند و هیچ توجهی به افکار منفی ندارد.&lt;BR&gt;هیچ نگران برگشت یا بروز یک فکر منفی جدید نباشید، اگر هر موردی پیش بیاید شما می‌توانید به آنها توجه نکرده و آنها را نپذیرید و در واقع به آنها اجازه دهید که یادآور این نکته باشند که تنها باید هرچه عمیق‌تر به افکار مثبت اندیشید.&lt;BR&gt;هرچه بیشتر بتوانید در طول روز افکار مثبت را در ذهن خود مرور کنید، زندگی شما سریع‌تر به حداکثر تغییرات و دگرگونی‌های خوب در کلیه موارد، دست خواهد یافت.&lt;BR&gt;اگر شما تنها یک روز خود را با گفت و گو در باره چیزهای خوب بگذرانید و از هر فرصتی قدردانی کنید، متوجه می‌شوید که به طور غیرارادی دیگر منتظر فردا نیستید که چه پیش خواهد آمد. چون همه چیز به طور طبیعی، سیر خود را طی می‌کند. به عبارت دیگر، شما به آن اندازه بر افکار و لحظه لحظه زندگی خود مسلط هستید که انتظار مفهومی ندارد.&lt;BR&gt;مرور افکارمثبت به طور عمیق، دقیقا مانند این است که در واقع، بذر این نوع افکار را در ذهن بکاریم. به این گونه شما وقتی به موارد مثبت می‌اندیشید، به درستی در حال کاشتن بذرهای پربارمطمئن و نیروبخش در درون خود هستید که قانون طبیعت و هستی در روند خود، آن‌ها را به باغی سرشار از زندگی، سرسبزی، آرامش و سعادت تبدیل می‌کند.&lt;BR&gt;بنابراین ما می‌توانیم با نوع زندگی و افکاری که انتخاب می‌کنیم و تا جایی که از آنها لبریز می‌شویم؛ بهشتی این چنین را در وجودمان متجلی سازیم. موفق باشید&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 06 Oct 2008 18:53:27 GMT</pubDate>
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